जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा
चौपाई ३, दोहा २८६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा॥ मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं॥ ३ ॥
अर्थ
जनक जी ने विश्वामित्र जी को प्रणाम किया [और कहा--] प्रभु की कृपा से श्रीरामचन्द्र जी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद