आजु दया दुखु दुसह सहावा
आजु दया दुखु दुसह सहावा
चौपाई २, दोहा २८० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥ बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥ २ ॥
अर्थ
आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजी ने मुसकराकर सिर नवाया [और कहा--] आपकी कृपारूपी मूर्ति भी आपकी अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद