बररै बालकु एकु सुभाऊ
बररै बालकु एकु सुभाऊ
चौपाई २, दोहा २७९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बररै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ॥ तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा॥ २ ॥
अर्थ
बड़े और बालक का एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने (लक्ष्मण ने) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद