मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें
चौपाई ३, दोहा २८३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें॥ भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा॥ ३ ॥
अर्थ
मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के भ्रम में मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद