निपटहिं द्विज करि जानहि मोही
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही
चौपाई १, दोहा २८३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥ चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू॥ १ ॥
अर्थ
तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को स्रुवा, बाण को आहुति और मेरे क्रोध को अत्यन्त घोर अग्नि जान।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद