कौसिक कहा छमिअ अपराधू

चौपाई ३, दोहा २७५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥ ३ ॥

अर्थ

विश्वामित्रजी ने कहा--अपराध क्षमा कीजिये। बालकों के दोष और गुण को साधु लोग नहीं गिनते। [परशुरामजी बोले--] तीखी धार का कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने--।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।

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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद