मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया
चौपाई १, दोहा २७८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया॥ टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने॥ १ ॥
अर्थ
मैं तुम्हारा अनुचर हूँ, मुनिराज। परित्याग करके क्रोध त्यागिये, अब दया कीजिये। टूटा चाप क्रोध करने से जुड़ नहीं जायेगा। बैठिये, पैर पिराने लगेंगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम के मध्य तीखा संवाद तथा परशुराम का शांत होना का वर्णन है।
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श्रीराम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद