जौं अहि सेज सयन हरि करहीं
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं
चौपाई ३, दोहा ६९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥ भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ
जैसे विष्णुभगवान् शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उन पर कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या