झूठि न होइ देवरिषि बानी
झूठि न होइ देवरिषि बानी
चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥ उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥ ४ ॥
अर्थ
देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा--हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय?
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या