सरिता सब पुनीत जलु बहहीं

चौपाई १, दोहा ६६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥ सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥ १ ॥

अर्थ

सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, मृग, भौंरे सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।

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पार्वती का जन्म और तपस्या