जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू
चौपाई ३, दोहा ७१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥ सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥ ३ ॥
अर्थ
यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी! इस बात को विचार कर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में संताप न हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या