सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई

चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥ समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ

गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उसे अपवित्र नहीं कहता। समर्थ को कोई दोष नहीं लगता, गोसाईं, सूर्य, अग्नि और गंगाजी की तरह।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
पार्वती का जन्म और तपस्या