उर धरि उमा प्रानपति चरना
उर धरि उमा प्रानपति चरना
चौपाई १, दोहा ७४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥ १ ॥
अर्थ
प्राणपति (शिवजी) के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था, तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों को तज दिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ७४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
पार्वती का जन्म और तपस्या