बर दायक प्रनतारति भंजन

चौपाई ४, दोहा ७० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥ ४ ॥

अर्थ

शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी वांछित फल नहीं मिलता।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।

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पार्वती का जन्म और तपस्या