त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि॥
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि॥
दोहा ६६ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि॥ कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥ ६६ ॥
अर्थ
और कहा— हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी गति सर्वत्र है। अतः आप हृदय में विचारकर कन्या के दोष-गुण कहिये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का दोहा ६६ है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या