जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल

दोहा ६७ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥ ६७ ॥

अर्थ

योगी, जटिल, अकाम मन, नग्न, अमंगल वेषवाला, ऐसा स्वामी इसको मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का दोहा ६७ है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।

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पार्वती का जन्म और तपस्या