बारहिं बार लेति उर लाई
बारहिं बार लेति उर लाई
चौपाई ४, दोहा ७२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥ जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥ ४ ॥
अर्थ
फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [माता के मन की दशा को जानकर] वे माता को सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलीं--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ७२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या