जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा
चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥ न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥ २ ॥
अर्थ
जो हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन्! पार्वती मुझको प्राणों के समान प्यारी है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “पार्वती का जन्म और तपस्या” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती के पार्वती रूप में जन्म और शिव-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या का वर्णन है।
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पार्वती का जन्म और तपस्या