नव अंबुज अंबक छबि नीकी

चौपाई २, दोहा १४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥ भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥ २ ॥

अर्थ

नेत्रों की छवि नये कमल के समान बड़ी सुन्दर थी। मनोहर चितवन जी को बहुत प्यारी लगती थी। टेढ़ी भौंहें कामदेव के धनुष की शोभा को हरनेवाली थीं। ललाट-पटल पर प्रकाशमय तिलक था।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।

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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान