जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई
चौपाई ३, दोहा १४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥ तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥ ३ ॥
अर्थ
जैसे कोई दरिद्र कल्पवृक्ष को पाकर भी अधिक संपत्ति माँगने में संकोच करता है, क्योंकि वह उसके प्रभाव को नहीं जानता, वैसे ही मेरे हृदय में संशय हो रहा है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान