अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ
चौपाई ४, दोहा १५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥ अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥ ४ ॥
अर्थ
ऐसा वर माँगकर राजा भगवान् के चरण पकड़े रह गये। तब दया के निधान भगवान ने कहा--ऐसा ही हो। अब तुम मेरी आज्ञा मानकर देवराज इन्द्र की राजधानी (अमरावती) में जाकर वास करो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान