सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना
चौपाई १, दोहा १५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥ जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥ १ ॥
अर्थ
[रानी की] कोमल, गूढ़ और मनोहर श्रेष्ठ वाक्यरचना सुनकर कृपासिंधु बोले--तुम्हारे मन में जो कुछ इच्छा है, वह सब मैंने तुम्हें दिया, इसमें कोई सन्देह न समझना।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान