सतरूपहि बिलोकि कर जोरें
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें
चौपाई २, दोहा १५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥ जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥ २ ॥
अर्थ
सतरूपाजी को हाथ जोड़े देखकर भगवान ने कहा-हे देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, सो वर माँग लो। [शतरूपा ने कहा--] हे नाथ! चतुर राजाने जो वर माँगा, हे कृपालु! वह मुझे बहुत ही प्रिय लगा।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
मनु-शतरूपा तप एवं वरदान