प्रभु सर्बग्य दास निज जानी
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी
चौपाई ३, दोहा १४५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥ मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥ ३ ॥
अर्थ
सर्वज्ञ प्रभु ने अनन्य गति वाले तपस्वी राजा-रानी को अपना निज दास जाना। तब परम गम्भीर और कृपामृत से सनी हुई यह आकाशवाणी हुई—“वर माँगो, वर माँगो।”
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान