केहरि कंधर चारु जनेऊ
केहरि कंधर चारु जनेऊ
चौपाई ४, दोहा १४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥ करि कर सरिस सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥ ४ ॥
अर्थ
सिंह की-सी गर्दन थी, सुन्दर जनेऊ था। भुजाओं के गहने भी सुन्दर थे। हाथी की सूँड़ के समान सुन्दर भुजदण्ड थे। कमर में तरकस और हाथ में बाण तथा धनुष शोभा पा रहे थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान