सो तुम्ह जानहु अंतरजामी
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी
चौपाई ४, दोहा १४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥ सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥ ४ ॥
अर्थ
हे स्वामी! आप अन्तर्यामी हैं, इसलिये उसे जानते ही हैं। मेरा वह मनोरथ पूरा कीजिये। [भगवान् ने कहा—] हे राजन्! संकोच छोड़कर मुझसे माँगो। तुम्हें न दे सकूँ ऐसा मेरे पास कुछ भी नहीं है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान