अस समुझत मन संसय होई
अस समुझत मन संसय होई
चौपाई ४, दोहा १५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥ जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥ ४ ॥
अर्थ
ऐसा समझने पर मन में सन्देह होता है, फिर भी प्रभु ने जो कहा वही प्रमाण (सत्य) है। [मैं तो यह माँगती हूँ कि] हे नाथ! आपके जो निज जन हैं वे जो (अलौकिक, अखण्ड) सुख पाते हैं और जिस परम गति को प्राप्त होते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।
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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान