एक लालसा बड़ि उर माहीं

चौपाई २, दोहा १४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीं॥ तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥ २ ॥

अर्थ

फिर भी मन में एक बड़ी लालसा है। उसका पूरा होना सहज भी है और अत्यन्त कठिन भी, इसी से उसे कहते नहीं बनता। हे स्वामी! आपके लिये तो उसका पूरा करना बहुत सहज है, पर मुझे अपनी कृपणता के कारण वह अत्यन्त कठिन मालूम होता है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।

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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान