प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई

चौपाई ३, दोहा १५० के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥ तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥ ३ ॥

अर्थ

हे प्रभु! बहुत ढिठाई हो रही है, यद्यपि हे भक्तों का हित करनेवाले! वह ढिठाई भी आपको अच्छी ही लगती है। आप ब्रह्मा आदि के जनक, जगत् के स्वामी और सब के हृदय के भीतर की जाननेवाले ब्रह्म हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मनु-शतरूपा तप एवं वरदान” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मनु-शतरूपा की कठोर तपस्या और भगवान द्वारा पुत्र रूप में प्रकट होने के वरदान का वर्णन है।

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मनु-शतरूपा तप एवं वरदान