देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा

देवता रामजी की विजय पर स्तुति करते हुए उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करते हैं। इन्द्र अमृत वर्षा करके रणभूमि में गिरे वानरों और भालुओं को पुनर्जीवन देते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३३ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई॥ आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी॥ १ ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुनाथजी की आज्ञा पाकर इन्द्र के सारथि मातलि चरणों में सिर नवाकर [रथ लेकर] चला गया। तदनन्तर सदा स्वार्थी देवता आये। वे ऐसे वचन कह रहे हैं मानो बड़े परमार्थी हों।

चौपाई

दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया॥ बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी॥ २ ॥

अर्थ:

हे दीनबन्धु ! हे दयालु रघुराज! हे परमदेव! आपने देवताओं पर बड़ी दया की। विश्व के द्रोह में तत्पर यह दुष्ट, कामी और कुमार्ग पर चलनेवाला रावण अपने ही पाप से नष्ट हो गया।

चौपाई

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥ ३ ॥

अर्थ:

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं।

चौपाई

मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी॥ जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो॥ ४ ॥

अर्थ:

आपने ही मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन और परशुरामके शरीर धारण किये। हे नाथ! जब-जब देवताओं ने दुःख पाया, तब-तब अनेक शरीर धारण करके आपने ही उनका दुःख नाश किया।

चौपाई

यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही॥ अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरें मन बिसमय आवा॥ ५ ॥

अर्थ:

यह दुष्ट मलिनहृदय, देवताओं का नित्य शत्रु, काम, लोभ और मद के परायण तथा अत्यन्त क्रोधी था। ऐसे अधमों के शिरोमणि ने भी आपका परमपद पा लिया। इस बात का हमारे मन में आश्चर्य हुआ।

चौपाई

हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥ भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥ ६ ॥

अर्थ:

हम देवता परम अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्ति को भुलाकर निरन्तर भवसागर के प्रवाह (जन्म-मृत्यु के चक्र) में पड़े हैं। अब हे प्रभो! हम आपकी शरण में आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये।

दोहा

करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि। अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥ ११० ॥

अर्थ:

विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे। तब अत्यन्त प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे--।

दोहा 111 के अंतर्गत
छन्द

जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥ भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥ १ ॥

अर्थ:

हे नित्य सुखधाम और [दुःखों को हरनेवाले] हरि! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिये सिंह के समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणों के समुद्र और परम चतुर हैं।

छन्द

तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥ जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥ २ ॥

अर्थ:

आपके शरीर की अनेकों कामदेवों के समान, परन्तु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनींद्र और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्प को गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया।

छन्द

जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥ अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! आप सेवकों को आनन्द देनेवाले, शोक और भय का नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वी का भार उतारनेवाला और ज्ञान का समूह है।

छन्द

अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥ रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥ ४ ॥

अर्थ:

[किन्तु अवतार लेने पर भी] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणा की खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्ष के साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारनेवाले तथा समस्त दोषों को हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [लंका का] राजा बना दिया।

छन्द

गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥ ५ ॥

अर्थ:

हे गुण और ज्ञान के भण्डार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारों से रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डों का प्रताप और बल प्रचण्ड है। दुष्टसमूह के नाश करने में आप परम निपुण हैं।

छन्द

बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥ भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥ ६ ॥

अर्थ:

हे बिना कारण दीनों पर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभा के धाम! मैं श्रीजानकीजी सहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागर से तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनों से परे हैं और मन से उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषों को हरनेवाले हैं।

छन्द

सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जलजारुन लोचन भूपबरं॥ सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥ ७ ॥

अर्थ:

आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं। [लाल] कमल के समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुख के मन्दिर, सुन्दर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममता के नाश करनेवाले हैं।

छन्द

अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो॥ इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥ ८ ॥

अर्थ:

आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियों के विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं।

छन्द

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥ धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥ ९ ॥

अर्थ:

हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [और] हे हरे! हमारे [अमर] जीवन और देव (दिव्य) शरीर को धिक्कार है, जो हम आपकी भक्ति से रहित हुए संसार में (सांसारिक विषयों में) भूल पड़े हैं।

छन्द

अब दीनदयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥ जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥ १० ॥

अर्थ:

हे दीनदयालु! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेदकारी बुद्धि को हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्द से विचरता हूँ।

छन्द

खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥ नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं॥ ११ ॥

अर्थ:

आप दुष्टों का खण्डन करनेवाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वती द्वारा सेवित हैं। हे राजाओं के नायक! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य] प्रेम हो।

दोहा

बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात। सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ १११ ॥

अर्थ:

इस प्रकार ब्रह्माजी ने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीर से विनती की। शोभा के समुद्र श्रीरामजी के दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।

दोहा 112 के अंतर्गत
चौपाई

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए॥ अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

उसी समय दशरथजी वहाँ आये। पुत्र (श्रीरामजी) को देखकर उनके नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल छा गया। छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित प्रभु ने उनकी वन्दना की और तब पिता ने उनको आशीर्वाद दिया।

चौपाई

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥ सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥ २ ॥

अर्थ:

[श्रीरामजी ने कहा--] हे तात! यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराज को जीत लिया। पुत्र के वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रों में जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी।

चौपाई

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥ ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी ने पहले के (जीवित काल के) प्रेम को विचारकर, पिता की ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूप का दृढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजी ने भेद-भक्ति में अपना मन लगाया था, इसी से उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया।

चौपाई

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥ ४ ॥

अर्थ:

[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त] सगुनस्वरूप की उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकार का मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभु को [इष्टबुद्धि से] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोक को चले गये।

दोहा

अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस। सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस॥ ११२ ॥

अर्थ:

छोटे भाई लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित परम कुशल प्रभु श्रीकोसलाधीश की शोभा देखकर देवराज इन्द्र मन में हर्षित होकर स्तुति करने लगे--।

दोहा 113 के अंतर्गत
छन्द

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम॥ धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप॥ १ ॥

अर्थ:

शोभा के धाम, शरणागत को विश्राम देनेवाले, धृत त्रोन, वर सर चाप, प्रबल प्रतापी भुजदण्डोंवाले श्रीरामचन्द्रजी की जय हो !

छन्द

जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥ यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥ २ ॥

अर्थ:

हे खर और दूषण के शत्रु और राक्षसों की सेना के मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गये।

छन्द

जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार॥ जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल॥ ३ ॥

अर्थ:

हे धरती का भार हरनेवाले! हे अपार उदार महिमावाले! आपकी जय हो। हे रावण के शत्रु! हे कृपालु! आपकी जय हो। आपने राक्षसों को बेहाल (तहस-नहस) कर दिया।

छन्द

लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब॥ मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग॥ ४ ॥

अर्थ:

लंकापति रावण को अपने बल का बहुत घमंड था। उसने देवता और गन्धर्व सभी को अपने वश में कर लिया था और वह मुनि, सिद्ध, मनुष्य, पक्षी और नाग आदि सभी के हठपूर्वक पीछे पड़ गया था।

छन्द

परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥ अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥ ५ ॥

अर्थ:

वह दूसरों से द्रोह करने में तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था। उस पापी ने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनों पर दया करनेवाले! हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाले! सुनिये।

छन्द

मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान॥ अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज॥ ६ ॥

अर्थ:

मुझे अत्यन्त अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं है, पर अब प्रभु के चरणकमलों के दर्शन करने से दुःख-समूह देनेवाला मेरा वह अभिमान जाता रहा।

छन्द

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव॥ मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप॥ ७ ॥

अर्थ:

कोई उन निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करते हैं जिन्हें वेद अव्यक्त (निराकार) कहते हैं। परन्तु हे रामजी ! मुझे तो आपका यह सगुण कोसलराज-स्वरूप ही प्रिय लगता है।

छन्द

बै‍देहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत॥ मोहि जानिऐ निज दास। दे भक्ति रमानिवास॥ ८ ॥

अर्थ:

श्रीजानकीजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित मेरे हृदय में अपना घर बनाइये। हे रमानिवास! मुझे अपना दास समझिये और अपनी भक्ति दीजिये।

छन्द

दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥ सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥

अर्थ:

हे रमानिवास! हे शरणागत के त्रास को हरनेवाले और सुख देनेवाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिये। हे सुखधाम राम! अनेक छविवाले रघुनायक! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देववृन्द को रञ्जन करनेवाले, द्वन्द्व-भंजन करनेवाले, मनुष्यतनु, अतुलित बलवाले, ब्रह्मादि संकर सेव्य, करुणा कोमल राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥

दोहा

अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल। काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल॥ ११३ ॥

अर्थ:

हे कृपालु अब मेरी ओर कृपा करके (कृपादृष्टि से) देखकर आज्ञा दीजिये कि मैं क्या [सेवा] करूँ! यह प्रिय वचन सुनकर दीनदयाल श्रीरामजी बोले--।

दोहा 114 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसिचरन्हि जे मारे॥ मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना॥ १ ॥

अर्थ:

हे देवराज! सुनो, हमारे वानर-भालू, जिन्हें निशाचरों ने मार डाला है, पृथ्वी पर पड़े हैं। इन्होंने मेरे हित के लिए अपने प्राण त्याग दिये। हे सुजान देवराज! इन सबको जिला दो।

चौपाई

सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

हे गरुड़! सुनिये, प्रभु के ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकी को मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्र को बड़ाई दी है।

चौपाई

सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥ सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥ ३ ॥

अर्थ:

इन्द्र ने अमृत बरसाकर वानर-भालुओं को जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभु के पास आये। अमृत की वर्षा दोनों ही दलों पर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।

चौपाई

रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥ सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥ ४ ॥

अर्थ:

क्योंकि राक्षसों के मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव-बन्धन छूट गये। किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजी की इच्छा से जीवित हो गये।

चौपाई

राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी॥ खल मल धाम कामरत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न॥ ५ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के समान दीनों का हित करनेवाला कौन है? जिन्होंने सारे राक्षसों को मुक्त कर दिया! दुष्ट, पापों के घर और कामी रावण ने भी वह गति पायी जिसे श्रेष्ठ मुनि भी नहीं पाते।

दोहा

सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान। देखि सुअवसर प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान॥ ११४ (क) ॥

अर्थ:

फूलों की वर्षा करके सब देवता सुन्दर विमानों पर चढ़-चढ़कर चले। तब सुअवसर जानकर सुजान शिवजी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के पास आये--।

दोहा

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि। पुलकिततनगदगदगिराँबिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ (ख) ॥

अर्थ:

और परम प्रेम से दोनों हाथ जोड़कर, कमल के समान नेत्रों में जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद वाणी से त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे--।

दोहा 115 के अंतर्गत
छन्द

मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥ मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥ १ ॥

अर्थ:

हे रघुकुल के स्वामी! सुन्दर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूह के [उड़ाने के] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वन के [भस्म करने के] लिये अग्नि हैं और देवताओं को आनन्द देनेवाले हैं।

छन्द

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥ काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥ २ ॥

अर्थ:

आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणों के धाम और परम सुन्दर हैं। भ्रमरूपी अन्धकार के [नाश के] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियों के [वध के] लिये सिंह के समान आप इस सेवक के मनरूपी वन में निरन्तर निवास कीजिये।

छन्द

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥ भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥ ३ ॥

अर्थ:

विषयकामनाओं के समूहरूपी कमलवन के [नाश के] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मन से परे हैं। भवसागर [को मथने] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भय को दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागर से पार कीजिये।

छन्द

स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥ अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥ मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥ ४-५ ॥

अर्थ:

हे श्यामसुन्दर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु! हे शरणागत को दुःख से छुड़ानेवाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरन्तर मेरे हृदय के अंदर निवास कीजिये। आप मुनियों को आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु और भय का नाश करनेवाले हैं।

दोहा

नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५ ॥

अर्थ:

हे नाथ! जब अयोध्यापुरी में आपका राजतिलक होगा, तब हे कृपासागर ! मैं आपकी उदार लीला देखने आऊँगा।