देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा
देवता रामजी की विजय पर स्तुति करते हुए उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करते हैं। इन्द्र अमृत वर्षा करके रणभूमि में गिरे वानरों और भालुओं को पुनर्जीवन देते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ३३ / ३७
प्रकरण पाठ
तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥ ३ ॥
अर्थ:
आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं।
हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी॥ भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे॥ ६ ॥
अर्थ:
हम देवता परम अधिकारी होकर भी स्वार्थपरायण हो आपकी भक्ति को भुलाकर निरन्तर भवसागर के प्रवाह (जन्म-मृत्यु के चक्र) में पड़े हैं। अब हे प्रभो! हम आपकी शरण में आ गये हैं, हमारी रक्षा कीजिये।
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥ भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥ १ ॥
अर्थ:
हे नित्य सुखधाम और [दुःखों को हरनेवाले] हरि! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिये सिंह के समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणों के समुद्र और परम चतुर हैं।
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥ अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥ ३ ॥
अर्थ:
हे प्रभो! आप सेवकों को आनन्द देनेवाले, शोक और भय का नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वी का भार उतारनेवाला और ज्ञान का समूह है।
अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥ रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥ ४ ॥
अर्थ:
[किन्तु अवतार लेने पर भी] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणा की खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्ष के साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारनेवाले तथा समस्त दोषों को हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [लंका का] राजा बना दिया।
गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं॥ भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं॥ ५ ॥
अर्थ:
हे गुण और ज्ञान के भण्डार! हे मानरहित! हे अजन्मा, व्यापक और मायिक विकारों से रहित श्रीराम! मैं आपको नित्य नमस्कार करता हूँ। आपके भुजदण्डों का प्रताप और बल प्रचण्ड है। दुष्टसमूह के नाश करने में आप परम निपुण हैं।
बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं॥ भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं॥ ६ ॥
अर्थ:
हे बिना कारण दीनों पर दया तथा उनका हित करनेवाले और शोभा के धाम! मैं श्रीजानकीजी सहित आपको नमस्कार करता हूँ। आप भवसागर से तारनेवाले हैं, कारणरूपा प्रकृति और कार्यरूप जगत् दोनों से परे हैं और मन से उत्पन्न होनेवाले कठिन दोषों को हरनेवाले हैं।
सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जलजारुन लोचन भूपबरं॥ सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं॥ ७ ॥
अर्थ:
आप मनोहर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले हैं। [लाल] कमल के समान रक्तवर्ण आपके नेत्र हैं। आप राजाओं में श्रेष्ठ, सुख के मन्दिर, सुन्दर, श्री (लक्ष्मीजी) के वल्लभ तथा मद (अहंकार), काम और झूठी ममता के नाश करनेवाले हैं।
अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो॥ इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥ ८ ॥
अर्थ:
आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियों के विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं।
कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए॥ धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे॥ ९ ॥
अर्थ:
हे व्यापक प्रभो! ये सब वानर कृतार्थरूप हैं, जो आदरपूर्वक ये आपका मुख देख रहे हैं। [और] हे हरे! हमारे [अमर] जीवन और देव (दिव्य) शरीर को धिक्कार है, जो हम आपकी भक्ति से रहित हुए संसार में (सांसारिक विषयों में) भूल पड़े हैं।
खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा॥ नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेमु सदा सुभदं॥ ११ ॥
अर्थ:
आप दुष्टों का खण्डन करनेवाले और पृथ्वी के रमणीय आभूषण हैं। आपके चरणकमल श्रीशिव-पार्वती द्वारा सेवित हैं। हे राजाओं के नायक! मुझे यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलों में सदा मेरा कल्याणदायक [अनन्य] प्रेम हो।
तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ॥ सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी॥ २ ॥
अर्थ:
[श्रीरामजी ने कहा--] हे तात! यह सब आपके पुण्यों का प्रभाव है, जो मैंने अजेय राक्षसराज को जीत लिया। पुत्र के वचन सुनकर उनकी प्रीति अत्यन्त बढ़ गयी। नेत्रों में जल छा गया और रोमावली खड़ी हो गयी।
रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना॥ ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी ने पहले के (जीवित काल के) प्रेम को विचारकर, पिता की ओर देखकर ही उन्हें अपने स्वरूप का दृढ़ ज्ञान करा दिया। हे उमा! दशरथजी ने भेद-भक्ति में अपना मन लगाया था, इसी से उन्होंने [कैवल्य] मोक्ष नहीं पाया।
सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥ ४ ॥
अर्थ:
[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त] सगुनस्वरूप की उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकार का मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभु को [इष्टबुद्धि से] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोक को चले गये।
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥ सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥
अर्थ:
हे रमानिवास! हे शरणागत के त्रास को हरनेवाले और सुख देनेवाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिये। हे सुखधाम राम! अनेक छविवाले रघुनायक! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देववृन्द को रञ्जन करनेवाले, द्वन्द्व-भंजन करनेवाले, मनुष्यतनु, अतुलित बलवाले, ब्रह्मादि संकर सेव्य, करुणा कोमल राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥
सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी॥ प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई॥ २ ॥
अर्थ:
हे गरुड़! सुनिये, प्रभु के ये वचन अत्यन्त गहन (गूढ़) हैं। ज्ञानी मुनि ही इन्हें जान सकते हैं। प्रभु श्रीरामजी त्रिलोकी को मारकर जिला सकते हैं। यहाँ तो उन्होंने केवल इन्द्र को बड़ाई दी है।
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥ मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥ १ ॥
अर्थ:
हे रघुकुल के स्वामी! सुन्दर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूह के [उड़ाने के] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वन के [भस्म करने के] लिये अग्नि हैं और देवताओं को आनन्द देनेवाले हैं।
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर॥ काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन॥ २ ॥
अर्थ:
आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणों के धाम और परम सुन्दर हैं। भ्रमरूपी अन्धकार के [नाश के] लिये प्रबल प्रतापी सूर्य हैं। काम, क्रोध और मदरूपी हाथियों के [वध के] लिये सिंह के समान आप इस सेवक के मनरूपी वन में निरन्तर निवास कीजिये।
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन॥ भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर॥ ३ ॥
अर्थ:
विषयकामनाओं के समूहरूपी कमलवन के [नाश के] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मन से परे हैं। भवसागर [को मथने] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भय को दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागर से पार कीजिये।
स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥ अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥ मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥ ४-५ ॥
अर्थ:
हे श्यामसुन्दर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु! हे शरणागत को दुःख से छुड़ानेवाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरन्तर मेरे हृदय के अंदर निवास कीजिये। आप मुनियों को आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु और भय का नाश करनेवाले हैं।