रामाकार भए तिन्ह के मन

चौपाई ४, दोहा ११४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन॥ सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा॥ ४ ॥

अर्थ

क्योंकि राक्षसों के मन तो मरते समय रामाकार हो गये थे। अतः वे मुक्त हो गये, उनके भव-बन्धन छूट गये। किन्तु वानर और भालू तो सब देवांश थे। इसलिये वे सब श्रीरघुनाथजी की इच्छा से जीवित हो गये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा