अनवद्य अखंड न गोचर गो

छन्द ८, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

अनवद्य अखंड न गोचर गो। सब रूप सदा सब होइ न गो॥ इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा॥ ८ ॥

अर्थ

आप अनिन्द्य या दोषरहित हैं, अखण्ड हैं, इन्द्रियों के विषय नहीं हैं। सदा सर्वरूप होते हुए भी आप वह सब कभी हुए ही नहीं, ऐसा वेद कहते हैं। यह [कोई] दंतकथा (कोरी कल्पना) नहीं है। जैसे सूर्य और सूर्य का प्रकाश अलग-अलग हैं और अलग नहीं भी हैं, वैसे ही आप भी संसार से भिन्न तथा अभिन्न दोनों ही हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ८, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा