जय राम सदा सुखधाम हरे
जय राम सदा सुखधाम हरे
छन्द १, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे॥ भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो॥ १ ॥
अर्थ
हे नित्य सुखधाम और [दुःखों को हरनेवाले] हरि! हे धनुष-बाण धारण किये हुए रघुनाथजी! आपकी जय हो। हे प्रभो! आप भव (जन्म-मरण) रूपी हाथी को विदीर्ण करने के लिये सिंह के समान हैं। हे नाथ! हे सर्वव्यापक! आप गुणों के समुद्र और परम चतुर हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द १, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा