अज ब्यापकमेकमनादि सदा

छन्द ४, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा॥ रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा॥ ४ ॥

अर्थ

[किन्तु अवतार लेने पर भी] आप नित्य, अजन्मा, व्यापक, एक (अद्वितीय) और अनादि हैं। हे करुणा की खान श्रीरामजी! मैं आपको बड़े ही हर्ष के साथ नमस्कार करता हूँ। हे रघुकुल के आभूषण! हे दूषण राक्षस को मारनेवाले तथा समस्त दोषों को हरनेवाले! विभीषण दीन था, उसे आपने [लंका का] राजा बना दिया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ४, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा