स्याम गात राजीव बिलोचन

छन्द ४-५, दोहा ११५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन॥ अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर॥ मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन॥ ४-५ ॥

अर्थ

हे श्यामसुन्दर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबन्धु! हे शरणागत को दुःख से छुड़ानेवाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरन्तर मेरे हृदय के अंदर निवास कीजिये। आप मुनियों को आनन्द देनेवाले, पृथ्वीमण्डल के भूषण, तुलसीदास के प्रभु और भय का नाश करनेवाले हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ४-५, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा