हनुमानजी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा
हनुमानजी अशोक वाटिका में पहुँचकर सीताजी को रामजी की कुशल और विजय का समाचार सुनाते हैं। इसके बाद सीताजी सम्मान सहित लाई जाती हैं और अग्नि परीक्षा के द्वारा उनकी पवित्रता समस्त लोक के सामने प्रकट होती है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ३२ / ३७
प्रकरण पाठ
दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥ ३ ॥
अर्थ:
हनुमानजी ने [सीताजी को] दूर से ही प्रणाम किया। जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजी का दूत है [और पूछा-- ] हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेनासहित कुशल से तो हैं ?
सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥ अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥ ४ ॥
अर्थ:
हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकार से सकुशल हैं। उन्होंने संग्राम में दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमानजी के वचन सुनकर सीताजी के हृदय में हर्ष छा गया।
अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥
अर्थ:
श्रीजानकीजी के हृदय में अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [आनन्दाश्रुओं का] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं--हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! [हनुमानजी ने कहा--] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत् का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु-सेना को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्रीरामजी को देख रहा हूँ॥
जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥ तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥ ४ ॥
अर्थ:
[सीताजी ने लीलासे कहा--] यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्रीरघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव, जो सबके मन की गति जानते हैं, [मेरे भी मन की गति जानकर] मेरे लिये चन्दन के समान शीतल हो जायँ।
श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥ प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँन लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चन्दन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गये। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं।
धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥ २ ॥
अर्थ:
तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णुभगवान् को लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो।