हनुमानजी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा

हनुमानजी अशोक वाटिका में पहुँचकर सीताजी को रामजी की कुशल और विजय का समाचार सुनाते हैं। इसके बाद सीताजी सम्मान सहित लाई जाती हैं और अग्नि परीक्षा के द्वारा उनकी पवित्रता समस्त लोक के सामने प्रकट होती है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३२ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना॥ समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु॥ १ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु ने हनुमानजी को बुला लिया। भगवान् ने कहा--तुम लंका जाओ। जानकी को सब समाचार सुनाओ और उसका कुशल-समाचार लेकर तुम चले आओ।

चौपाई

तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए॥ बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही॥ २ ॥

अर्थ:

तब हनुमानजी नगर में आये। सुनकर निसिचरीं और निसाचर दौड़े। उन्होंने बहुत प्रकार से हनुमानजी की पूजा की और फिर जनकसुता को दिखला दिया।

चौपाई

दूरिहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकी चीन्हा॥ कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता॥ ३ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने [सीताजी को] दूर से ही प्रणाम किया। जानकीजी ने पहचान लिया कि यह वही श्रीरघुनाथजी का दूत है [और पूछा-- ] हे तात! कहो, कृपा के धाम मेरे प्रभु छोटे भाई और वानरों की सेनासहित कुशल से तो हैं ?

चौपाई

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा॥ अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो॥ ४ ॥

अर्थ:

हे माता! कोसलपति श्रीरामजी सब प्रकार से सकुशल हैं। उन्होंने संग्राम में दस सिर वाले रावण को जीत लिया है और विभीषण ने अचल राज्य प्राप्त किया है। हनुमानजी के वचन सुनकर सीताजी के हृदय में हर्ष छा गया।

छन्द

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रैलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा॥ सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं॥

अर्थ:

श्रीजानकीजी के हृदय में अत्यन्त हर्ष हुआ। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में [आनन्दाश्रुओं का] जल छा गया। वे बार-बार कहती हैं--हे हनुमान्! मैं तुझे क्या दूँ? इस वाणी (समाचार) के समान तीनों लोकों में और कुछ भी नहीं है! [हनुमानजी ने कहा--] हे माता! सुनिये, मैंने आज निःसन्देह सारे जगत् का राज्य पा लिया, जो मैं रण में शत्रु-सेना को जीतकर भाई सहित निर्विकार श्रीरामजी को देख रहा हूँ॥

दोहा

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत॥ १०७ ॥

अर्थ:

[जानकीजी ने कहा--] हे पुत्र! सुन, समस्त सद्गुण तेरे हृदय में बसें और हे हनुमान्! शेष (लक्ष्मणजी) सहित कोसलपति प्रभु सदा तुझ पर अनुकूल रहें।

दोहा 108 के अंतर्गत
चौपाई

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता॥ तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई॥ १ ॥

अर्थ:

हे तात! अब तुम वही उपाय करो जिससे मैं इन नेत्रों से प्रभु के कोमल श्याम शरीर के दर्शन करूँ। तब श्रीरामचन्द्रजी के पास जाकर हनुमानजी ने जानकीजी का कुशल-समाचार सुनाया।

चौपाई

सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन॥ मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु॥ २ ॥

अर्थ:

सूर्यकुलभूषण श्रीरामजी ने सन्देश सुनकर युवराज अंगद और विभीषण को बुला लिया [और कहा--] पवनपुत्र हनुमान के साथ जाओ और जानकी को आदर के साथ ले आओ।

चौपाई

तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता॥ बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो॥ ३ ॥

अर्थ:

वे सब तुरंत ही वहाँ गये जहाँ सीताजी थीं। सब-की-सब राक्षसियाँ विनीतपूर्वक उनकी सेवा कर रही थीं। विभीषणजी ने शीघ्र ही उन लोगों को समझा दिया। उन्होंने बहुत प्रकार से स्नान कराया।

चौपाई

बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए॥ ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही॥ ४ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार के भूषण पहिराए और फिर एक रुचिर सिबिका सजाकर ले आये। सीताजी प्रसन्न होकर सुखधाम सनेही श्रीरामजी का स्मरण करके उस पर हर्ष के साथ चढ़ीं।

चौपाई

बेतपानि रच्छक चहु पासा। चले सकल मन परम हुलासा॥ देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए॥ ५ ॥

अर्थ:

चारों ओर हाथों में छड़ी लिये रक्षक चले। सबके मनों में परम उल्लास है। रीछ-वानर सब दर्शन करने के लिये आये, तब रक्षक क्रोध करके उनको रोकने दौड़े।

चौपाई

कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु॥ देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाईं॥ ६ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीर ने कहा--हे मित्र! मेरा कहना मानो और सीता को पैदल ले आओ, जिससे वानर उसे माता की तरह देखें। गोसाईं श्रीरामजी ने हँसकर ऐसा कहा।

चौपाई

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे॥ सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी॥ ७ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर रीछ-वानर हर्षित हो गये। आकाश से देवताओं ने बहुत-से फूल बरसाये। सीता को पहले अग्नि में रखा गया था। अब भीतर के साक्षी को प्रकट करना चाहते हैं।

दोहा

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद॥ १०८ ॥

अर्थ:

इसी कारण करुणा के भण्डार श्रीरामजी ने लीला से कुछ कड़े वचन कहे, जिन्हें सुनकर सब राक्षसियाँ विषाद करने लगीं।

दोहा 109 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता॥ लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचनों को सिर चढ़ाकर मन, वचन और कर्म से पवित्र श्रीसीताजी बोलीं--हे लक्ष्मण! तुम मेरे धर्म के नेगी (धर्माचरण में सहायक) बनो और तुरंत आग तैयार करो।

चौपाई

सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी॥ लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीसीताजी की विरह, विवेक, धर्म और नीति से सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजी के नेत्रों में [विषाद के आँसुओं का] जल भर आया। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभु से कुछ कह नहीं सकते।

चौपाई

देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए॥ पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामजी का रुख देखकर लक्ष्मणजी दौड़े और आग तैयार करके बहुत-सी लकड़ी ले आये। अग्नि को खूब बढ़ी हुई देखकर जानकीजी के हृदय में हर्ष हुआ। उन्हें भय कुछ भी नहीं हुआ।

चौपाई

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं॥ तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना॥ ४ ॥

अर्थ:

[सीताजी ने लीलासे कहा--] यदि मन, वचन और कर्म से मेरे हृदय में श्रीरघुवीर को छोड़कर दूसरी गति (अन्य किसी का आश्रय) नहीं है, तो अग्निदेव, जो सबके मन की गति जानते हैं, [मेरे भी मन की गति जानकर] मेरे लिये चन्दन के समान शीतल हो जायँ।

छन्द

श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली॥ प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँन लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामजी का स्मरण करके और जिनके चरण महादेवजी के द्वारा वन्दित हैं तथा जिनमें सीताजी की अत्यन्त विशुद्ध प्रीति है, उन कोसलपति की जय बोलकर जानकीजी ने चन्दन के समान शीतल हुई अग्नि में प्रवेश किया। प्रतिबिम्ब (सीताजी की छायामूर्ति) और उनका लौकिक कलंक प्रचण्ड अग्नि में जल गये। प्रभु के इन चरित्रों को किसी ने नहीं जाना। देवता, सिद्ध और मुनि सब आकाश में खड़े देखते हैं।

छन्द

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो॥ सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली॥ २ ॥

अर्थ:

तब अग्नि ने शरीर धारण करके वेदों में और जगत् में प्रसिद्ध वास्तविक श्री (सीताजी) का हाथ पकड़ उन्हें श्रीरामजी को वैसे ही समर्पित किया जैसे क्षीरसागर ने विष्णुभगवान् को लक्ष्मी समर्पित की थी। वे सीताजी श्रीरामचन्द्रजी के वाम भाग में विराजित हुईं। उनकी उत्तम शोभा अत्यन्त ही सुन्दर है। मानो नये खिले हुए नीले कमल के पास सोने के कमल की कली सुशोभित हो।

दोहा

बरषहिं सुमन हरषि सुर बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान॥ १०९ (क) ॥

अर्थ:

देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे। आकाश में डंके बजने लगे। किन्नर गाने लगे। विमानों पर चढ़ी अप्सराएँ नाचने लगीं।

दोहा

जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार। देखि भालुकपि हरषे जय रघुपति सुख सार॥ १०९ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीजानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की अपरिमित और अपार शोभा देखकर रीछ-वानर हर्षित हो गये और सुख के सार श्रीरघुनाथजी की जय बोलने लगे।