जन रंजन भंजन सोक भयं
जन रंजन भंजन सोक भयं
छन्द ३, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं॥ अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं॥ ३ ॥
अर्थ
हे प्रभो! आप सेवकों को आनन्द देनेवाले, शोक और भय का नाश करनेवाले, सदा क्रोधरहित और नित्य ज्ञानस्वरूप हैं। आपका अवतार श्रेष्ठ, अपार दिव्य गुणोंवाला, पृथ्वी का भार उतारनेवाला और ज्ञान का समूह है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ३, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा