विभीषण की प्रार्थना, श्रीरामजी द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन, और शीघ्र अयोध्या पहुँचने का अनुरोध
विभीषण विनयपूर्वक प्रभु से कुछ समय लंका में ठहरने की प्रार्थना करते हैं। श्रीरामजी भरतजी की विरहपूर्ण प्रेमदशा का वर्णन करते हुए शीघ्र अयोध्या पहुँचने की अपनी आतुरता प्रकट करते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ३४ / ३७
प्रकरण पाठ
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥ देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥ ३ ॥
अर्थ:
अब हे प्रभु! इस दास के घर को पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्ध की थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति का निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरों को दीजिये।
सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥ सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥ ४ ॥
अर्थ:
हे नाथ! मुझे सब प्रकार से अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरी को पधारिये। विभीषणजी के कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभु के दोनों विशाल नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया।