विभीषण की प्रार्थना, श्रीरामजी द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन, और शीघ्र अयोध्या पहुँचने का अनुरोध

विभीषण विनयपूर्वक प्रभु से कुछ समय लंका में ठहरने की प्रार्थना करते हैं। श्रीरामजी भरतजी की विरहपूर्ण प्रेमदशा का वर्णन करते हुए शीघ्र अयोध्या पहुँचने की अपनी आतुरता प्रकट करते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ३४ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥ १ ॥

अर्थ:

जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभु के पास आये और चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोले--हे शार्ङ्गधनुष के धारण करनेवाले प्रभो! मेरी विनती सुनिये--।

चौपाई

सकुल सदल प्रभु रावन मार्‌यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार्‌यो॥ दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती॥ २ ॥

अर्थ:

आपने कुल और सेनासहित रावण का वध किया, त्रिभुवन में अपना पवित्र यश फैलाया और मुझ दीन, पापी, बुद्धिहीन और जातिहीन पर बहुत प्रकार से कृपा की।

चौपाई

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥ देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥ ३ ॥

अर्थ:

अब हे प्रभु! इस दास के घर को पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्ध की थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति का निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरों को दीजिये।

चौपाई

सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ॥ सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मुझे सब प्रकार से अपना लीजिये और फिर हे प्रभो! मुझे साथ लेकर अयोध्यापुरी को पधारिये। विभीषणजी के कोमल वचन सुनते ही दीनदयालु प्रभु के दोनों विशाल नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं का] जल भर आया।

दोहा

तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥ ११६ (क) ॥

अर्थ:

[ श्रीरामजी ने कहा--] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है। पर भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है।

दोहा

तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि। देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि॥ ११६ (ख) ॥

अर्थ:

तपस्वी के वेष में कृश (दुबले) शरीर से निरन्तर मेरा नाम जप कर रहे हैं। हे सखा! वही उपाय करो जिससे मैं जल्दी-से-जल्दी उन्हें देख सकूँ। मैं तुमसे निहोरा (अनुरोध) करता हूँ।

दोहा

बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर। सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर॥ ११६ (ग) ॥

अर्थ:

यदि अवधि बीत जाने पर मैं जाऊँ तो भाई को जीता न पा सकूँगा। छोटे भाई भरतजी की प्रीति का स्मरण करके प्रभु का शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है।

दोहा

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं। पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं॥ ११६ (घ) ॥

अर्थ:

[ श्रीरामजी ने फिर कहा--] हे विभीषण ! तुम कल्पभर राज्य करना, मन में मेरा निरन्तर स्मरण करते रहना। फिर तुम मेरे उस धाम को पा जाओगे जहाँ सब संत जाते हैं।