अब दीनदयाल दया करिऐ

छन्द १०, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

अब दीनदयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ॥ जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ॥ १० ॥

अर्थ

हे दीनदयालु! अब दया कीजिये और मेरी उस विभेदकारी बुद्धि को हर लीजिये, जिससे मैं विपरीत कर्म करता हूँ और जो दुःख है, उसे सुख मानकर आनन्द से विचरता हूँ।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द १०, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा