परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन
दोहा ११४ (ख) · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि। पुलकिततनगदगदगिराँबिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ (ख) ॥
अर्थ
और परम प्रेम से दोनों हाथ जोड़कर, कमल के समान नेत्रों में जल भरकर, पुलकित शरीर और गद्गद वाणी से त्रिपुरारि शिवजी विनती करने लगे--।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का दोहा ११४ (ख) है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा