जय दूषनारि खरारि

छन्द २, दोहा ११३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि॥ यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ॥ २ ॥

अर्थ

हे खर और दूषण के शत्रु और राक्षसों की सेना के मर्दन करनेवाले! आपकी जय हो! हे नाथ! आपने इस दुष्ट को मारा, जिससे सब देवता सनाथ (सुरक्षित) हो गये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द २, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा