मामभिरक्षय रघुकुल नायक

छन्द १, दोहा ११५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक॥ मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन॥ १ ॥

अर्थ

हे रघुकुल के स्वामी! सुन्दर हाथों में श्रेष्ठ धनुष और सुन्दर बाण धारण किये हुए आप मेरी रक्षा कीजिये। आप महामोहरूपी मेघसमूह के [उड़ाने के] लिये प्रचण्ड पवन हैं, संशयरूपी वन के [भस्म करने के] लिये अग्नि हैं और देवताओं को आनन्द देनेवाले हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द १, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा