दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन
छन्द, दोहा ११३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं॥ सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुजतनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं॥
अर्थ
हे रमानिवास! हे शरणागत के त्रास को हरनेवाले और सुख देनेवाले! मुझे अपनी भक्ति दीजिये। हे सुखधाम राम! अनेक छविवाले रघुनायक! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे देववृन्द को रञ्जन करनेवाले, द्वन्द्व-भंजन करनेवाले, मनुष्यतनु, अतुलित बलवाले, ब्रह्मादि संकर सेव्य, करुणा कोमल राम! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा