सुधा बरषि कपि भालु जिआए
सुधा बरषि कपि भालु जिआए
चौपाई ३, दोहा ११४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए॥ सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर॥ ३ ॥
अर्थ
इन्द्र ने अमृत बरसाकर वानर-भालुओं को जिला दिया। सब हर्षित होकर उठे और प्रभु के पास आये। अमृत की वर्षा दोनों ही दलों पर हुई। पर रीछ-वानर ही जीवित हुए, राक्षस नहीं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा