बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति
दोहा १११ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात। सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ १११ ॥
अर्थ
इस प्रकार ब्रह्माजी ने अत्यन्त प्रेम-पुलकित शरीर से विनती की। शोभा के समुद्र श्रीरामजी के दर्शन करते-करते उनके नेत्र तृप्त ही नहीं होते थे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का दोहा १११ है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा