तन काम अनेक अनूप छबी
तन काम अनेक अनूप छबी
छन्द २, दोहा १११ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी॥ जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा॥ २ ॥
अर्थ
आपके शरीर की अनेकों कामदेवों के समान, परन्तु अनुपम छवि है। सिद्ध, मुनींद्र और कवि आपके गुण गाते रहते हैं। आपका यश पवित्र है। आपने रावणरूपी महासर्प को गरुड़ की तरह क्रोध करके पकड़ लिया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द २, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा