तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी

चौपाई ३, दोहा ११० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी॥ अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय॥ ३ ॥

अर्थ

आप समरूप, ब्रह्म, अविनाशी, नित्य, एकरस, स्वभाव से ही उदासीन (शत्रु-मित्र-भावरहित), अखण्ड, निर्गुण (मायिक गुणों से रहित), अजन्मा, निष्पाप, निर्विकार, अजेय, अमोघशक्ति (जिनकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और दयामय हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा