करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे

दोहा ११० · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि। अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥ ११० ॥

अर्थ

विनती करके देवता और सिद्ध सब जहाँ-के-तहाँ हाथ जोड़े खड़े रहे। तब अत्यन्त प्रेम से पुलकित शरीर होकर ब्रह्माजी स्तुति करने लगे--।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का दोहा ११० है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा