परद्रोह रत अति दुष्ट
परद्रोह रत अति दुष्ट
छन्द ५, दोहा ११३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट॥ अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल॥ ५ ॥
अर्थ
वह दूसरों से द्रोह करने में तत्पर और अत्यन्त दुष्ट था। उस पापी ने वैसा ही फल पाया। अब हे दीनों पर दया करनेवाले! हे कमल के समान विशाल नेत्रों वाले! सुनिये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का छन्द ५, दोहा ११३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।
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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा