सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं

चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं॥ बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा॥ ४ ॥

अर्थ

[मायारहित सच्चिदानन्दमय स्वरूपभूत दिव्यगुणयुक्त] सगुनस्वरूप की उपासना करनेवाले भक्त इस प्रकार का मोक्ष लेते भी नहीं। उनको श्रीरामजी अपनी भक्ति देते हैं। प्रभु को [इष्टबुद्धि से] बार-बार प्रणाम करके दशरथजी हर्षित होकर देवलोक को चले गये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में देवताओं की राम-स्तुति और इन्द्र द्वारा अमृत वर्षा से वानर-भालुओं का पुनर्जीवन का वर्णन है।

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देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा